गुरुवार, 23 जनवरी 2014

बदलती सोच बदलते हम




आज कल हमारे देश मे एक शब्द बहुत चलन मे है बलत्कार(RAPE)। ये शब्द चाहे किसी भी रूप मे हो लेकिन इस शब्द से हमारे देश की विश्व मे बहुत ही बदनामी होती है।इन सब चिजो को देख कर मन मे बहुत ही पीड़ा होती है
इस शब्द या घटना के दो पक्ष होते है,एक स्त्री और एक पुरूष,एक पिड़ित और एक अपराधी।चूकि हमारा समाज पुरूष प्रधान है इसलिए कभी भी या कही भी इस तरह कि घटना होने पर पुरूष  ही जिम्मेदार होता है, और होना भी चाहीये,क्योकि हमारा समाज पुरूष प्रधान है।
हमारे समाज मे वैदिक काल मे जब ये पुरूष प्रधान व्यवस्था बनाई गई थी तब दोनो के लिये कुछ मर्यादा निश्चित किया गया था जिससे इस तरह की घटनाओ पर कुछ हद तक अंकुश लगा था,पर आज कल इन घटनाओ को देखकर मन मे कुछ सवाल उठते है,कि क्या आज के समय मे स्त्री और परूष दोनो अपने मर्यादा मे है,क्या इन सब घटनाओ के लिए केवल और केवल पुरूष ही जिम्मेदार है,क्या समाज की कोई जिम्मेदारी नही बनती,क्या उन लड़को के मॉ बाप की कोई जिम्मेदारी नही होती जो आपराधी होते है या उन लड़कियो के मॉ बाप की कोई जिम्मेदारी नही होती जो पिड़िता होती है।
मेरा मानना है कि अपराधी और पिड़ता से पहले हम सब की जिम्मेदारी बनती है,पूरे समाज की जिम्मेदारी बनती है।आज हम विकास और सभ्यता के नाम पर जिस तरह से पश्चिमी देशो का अंधानुकरण करते जा रहे है इसी का परिणाम है, इस तरह कि घटनाए। हमारे समाज का निर्माण पश्चिम को ध्यान मे रख कर नही किया गया था ।
हमे अपने बच्चो को उनकी मर्यादा का बोध करवाना होगा। लड़कियो को ये बताना होगा कि उनको भारतीय समाज मे रहना है न कि पश्चिमी समाज मे,उस समाज मे जहॉ सूरत से ज्यादा सिरत को महत्व दिया जाता है
और लड़को को ये बताना होगा की स्त्रीया उपभोग की वस्तु नही होती है जैसा कि पश्चिमी समाज मे समझा जाता है बल्की हमारे समाज मे स्त्री किसी की मॉ है तो किसी की बहन है वह हमेशा भारतीय समाज मे आदर योग्य होती है,और हमारे आस पास टी वी चैनलो के माध्यम से तथा अन्य माध्यमो जो गंदगी तथा अश्लिलता परोसी जाती है उसका पुरजोर विरोध करना होगा,तभी हम इस बलत्कार नाम के कलंक से मुक्त हो पायेंगे नही तो हम हमेशा इन घटनाओ की जिम्मेदारी किसी पुरूष पर डल कर छाती पिटते रह जायेंगे

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